देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाली कृषि को लेकर हर बजट से किसानों को बड़ी उम्मीदें रहती हैं। बजट 2026 भी इससे
अलग नहीं था। सरकार ने “विकसित भारत” के लक्ष्य को सामने रखते हुए कई घोषणाएँ कीं, लेकिन सवाल यह है कि ज़मीनी स्तर
पर किसान को इससे कितना लाभ मिलेगा। इस लेख में हम बजट 26 में कृषि क्षेत्र को क्या मिला और क्या छूट गया, दोनों का
आकलन कर रहे हैं।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी, 2026 को संसद में आगामी वित्तीय वर्ष का सरकारी बजट पेश किया। वे लगातार नौ
बजट पेश करने वाली पहली वित्त मंत्री बनीं। उन्होंने वर्ष 2026-27 के लिए भारत सरकार के अनुमानित आय और व्यय का विवरण
प्रस्तुत किया। सीतारामन ने कहा कि हम विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर हैं। हमने यह निश्चय किया है कि
विकास का लाभ किसानों, आदिवासियों, महिलाओं और युवाओं तक पहुंचना चाहिए। सभी बदलावों और कटौतियों के बीच देखते हैं
किसान कि आशा और निराशा. आइए जानते हैं कि इस बजट में कृषि क्षेत्र के लिए क्या घोषणाएं की गई हैं?
वित्त मंत्री सीतारमण ने पिछले बजट में कृषि को विकास का “प्रथम इंजन” बताया था और अपने भाषण की शुरुआत इस क्षेत्र के लिए
सरकार की प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हुए की, और कहा था कि कृषि क्षेत्र अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है। केंद्रीय वित्त मंत्री
निर्मला सीतारमण का बजट भाषण कृषि क्षेत्र विशेष रूप से चर्चा में रहा था, जिसमें उन्होंने इस क्षेत्र पर केंद्रित कम से कम नौ नए
मिशनों या कार्यक्रमों की घोषणा की थी, साथ ही देश को "विश्व की खाद्य टोकरी" बनाने में किसानों की भूमिका को भी मान्यता दी।
ठीक विपरीत बजट 2026 में 85 मिनट के भाषण में 48 मिनट बाद कृषि शब्द सुनाई दिया कुछ आशा जगी लेकिन वास्तविक
किसान के लिए आशा जल्द ही निराशा में बदल गई और बजट 2026 में कृषि के लिए बजट आवंटन 3.38% से घटकर 3.04%
हो गया है। हालांकि, कृषि मंत्रालय को 1.37 लाख करोड़ रुपये का आवंटन मिला है, जो पिछले साल के 1.27 लाख करोड़ से
मामूली बढ़ोतरी दिखाता है, लेकिन महंगाई और बढ़ती लागतों को ध्यान में रखें तो यह रियल टर्म्स में नेगेटिव वृद्धि है। पिछले दस
वर्षों में कृषि बजट कई गुना बढ़ा है, लेकिन किसानों की वास्तविक आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। डीजल, खाद, बीज और
कीटनाशकों की बढ़ती कीमतों ने सरकारी सहायता को काफी हद तक निष्प्रभावी कर दिया है। ज्यादा आमदनी देने वाली फसलों को
प्राथमिकता दी गई है। लेकिन छोटे किसानों की समस्या का कोई समाधान नहीं है। बजट से साफ है कि कृषि और किसान सरकार
की प्राथमिकता नहीं दिखाई दी। यह बजट आर्थिक सर्व्रेक्षण और बजट पूर्व परामर्श से बिलकुल परे रहा है।
खेती में तकनीक को बढ़ावा देने के लिए एक बड़े कदम के तहत, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट 2026-27 में 'भारत
विस्तार' लॉन्च करने की घोषणा की. यह एक मल्टीलिंगुअल (कई भाषाओं) AI टूल है जो एग्रीस्टैक पोर्टल और ICAR की कृषि
पद्धतियों को एडवांस्ड AI सिस्टम के साथ इंटीग्रेट करेगा, जिससे किसानों के संसाधन एक्सेस करने और फैसले लेने के तरीके में
बदलाव आएगा. वित्त मंत्री के मुताबिक, भारत विस्तार नाम का यह प्लेटफॉर्म खेती की प्रोडक्टिविटी बढ़ाएगा, जोखिम कम करने के
लिए कस्टमाइज्ड सलाह देगा, और लाखों किसानों को जमीनी स्तर पर बेहतर विकल्प चुनने में मदद करेगा, जो खेती में AI इंटीग्रेशन
के लिए सरकार के विजन के मुताबिक है.सरकार और कॉरपोरेट क्षेत्र यह दावा कर रहे हैं कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI), ड्रोन
और डिजिटल तकनीक किसानों की आय बढ़ाने में क्रांतिकारी भूमिका निभाएगी। लेकिन ज़मीनी हकीकत इस दावे को पूरी तरह सही
साबित नहीं करती। तकनीक खेती का साधन हो सकती है, किसान की आय की गारंटी नहीं।
भारत में 85 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास न तो पूंजी है और न ही महंगी तकनीक अपनाने की क्षमता।
ड्रोन, सेंसर, सैटेलाइट डेटा और AI आधारित ऐप्स आज भी बड़े किसानों और कॉरपोरेट फार्मिंग तक सीमित हैं। ऐसे में तकनीक से
होने वाला लाभ एक छोटे वर्ग तक सिमट कर रह जाता है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि किसान की आय उत्पादन से नहीं, दाम से
तय होती है। अगर तकनीक से पैदावार बढ़ भी जाए, लेकिन MSP की कानूनी गारंटी न हो और बाज़ार में दाम गिर जाएं, तो
किसान को नुकसान ही होता है। इतिहास गवाह है कि अधिक उत्पादन के बावजूद किसान घाटे में गया है। AI आधारित खेती में
किसान के डेटा का सवाल भी गंभीर है। यह स्पष्ट नहीं है कि खेत, फसल और मिट्टी से जुड़ा डेटा किसके नियंत्रण में होगा। अगर इसका
लाभ निजी कंपनियों को मिला और जोखिम किसान के हिस्से आया, तो तकनीक शोषण का नया माध्यम बन सकती है। तकनीक तब
ही कारगर होगी जब उसे मजबूत कृषि नीति से जोड़ा जाए—कानूनी MSP, भरोसेमंद फसल बीमा, लागत नियंत्रण और बाज़ार
सुरक्षा के साथ। बिना आर्थिक सुरक्षा के AI केवल एक आकर्षक नारा है।
कृषि क्षेत्र पर बोलते हुए केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कृषि विभाग का बजट बढ़ाकर इस वर्ष 1,32,561 करोड़
रुपये कर दिया गया है।उन्होंने बताया कि कृषि शिक्षा और अनुसंधान, विशेषकर आईसीएआर सहित, के लिए 9,967 करोड़ रुपये का
प्रावधान किया गया है, जिससे शोध और नवाचार को बल मिलेगा। किसानों के लिए उर्वरक सब्सिडी पर उन्होंने कहा कि सस्ता खाद
और उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए 1,70,944 करोड़ रुपये की सब्सिडी का प्रावधान है, ताकि उत्पादन की लागत कम हो और
किसान को राहत मिले।
श्री चौहान ने कहा कि नेशनल फाइबर स्कीम के अंतर्गत सिल्क, वूल और जूट जैसे फाइबर पर फोकस किया गया है, जिससे इनसे जुड़े
किसानों को सीधा लाभ मिलेगा।उन्होंने यह भी कहा कि आयुष मंत्रालय में मेडिसिनल प्लांट्स के सर्टिफिकेशन और एक्सपोर्ट से
संबंधित प्रावधानों का फायदा औषधीय पौधे उगाने वाले किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद करेगा। उन्होंने कहा कि परंपरागत
फसलों के साथ‑साथ नारियल, कोको, काजू और चंदन की लकड़ी जैसी उच्च‑मूल्य फसलों के लिए भी स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं।
नारियल के पुराने बागों का पुनरुद्धार और नए बाग लगाने के लिए बजट में व्यवस्था की गई है।उन्होंने यह भी कहा कि फलों और
सब्ज़ियों का उत्पादन बढ़ाने और उन्हें आसानी से उपभोक्ता तक पहुँचाने के लिए अलग प्रावधान किए गए हैं, ताकि किसान को बेहतर
दाम और उपभोक्ता को आसान उपलब्धता मिल सके।
किसान चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स – बजट 26 में कृषि को लेकर दिशा तो दिखाई देती है, लेकिन गति और गहराई दोनों की कमी महसूस
होती है। तकनीक, निवेश और दीर्घकालीन सुधार ज़रूरी हैं, पर साथ ही किसानों की तत्काल समस्याओं — आय, MSP, कर्ज़ और
जोखिम भरी नीतियां — का समाधान भी उतना ही आवश्यक है। यदि भारत को सच में विकसित राष्ट्र बनाना है, तो किसान को
केवल “लाभार्थी” नहीं बल्कि “आर्थिक भागीदार” मानते हुए नीतियाँ बनानी होंगी। आने वाले समय में सरकार से अपेक्षा है कि वह
संवाद के ज़रिये किसानों की वास्तविक ज़रूरतों को समझे और बजट के वादों को खेत तक पहुँचाए।
बजट 26 में कृषि के नाम पर कई बड़े-बड़े शब्द उछाले गए — डिजिटल खेती, एग्री-स्टार्टअप, स्मार्ट एग्रीकल्चर, विकसित भारत।
लेकिन जब किसान अपने खेत में खड़ा होकर हिसाब लगाता है, तो उसे साफ़ दिखता है कि उसकी जेब, उसकी फसल और उसका
भविष्य — तीनों ही असुरक्षित हैं। बजट 26 ने यह साफ़ कर दिया है कि कृषि को भाषणों में सम्मान है, नीतियों में नहीं। अगर यही
रवैया जारी रहा, तो खेती से भरोसा उठेगा, युवा खेती छोड़ेंगे और खाद्य सुरक्षा पर संकट गहराएगा। ‘विकसित भारत – आत्मनिर्भर
भारत’ जैसे नारे सपने ही रह जायेंगे।