आधुनिक युग ने भुला दिया मुझे मै बस एक छूटे हुए सुर की तान हूँ,
बचा सके तो बचा ले मुझे ए राष्ट्रभक्त, मैं किसान हूँ!
हमारे देश में जब तक सत्ता में बैठे लोग किसान को किसान न मान कर उन्हें सस्ते मजदूर और राजनीति के लिए प्रयोग होने वाली वस्तु मानते रहेंगें और इन्ही को मध्यनजर रखते हुए सरकारें नीतियां बनाती रहेंगी, किसान अपने बल पर कभी नहीं खड़ा हो पायेगा और न ही उसको परिवार के साथ एक मानव जिंदगी जीने का अधिकार प्राप्त होगा.किसान का मुख्य संकट आर्थिक है. बेशक ये अन्न दाता है और देश को समय-समय पर आर्थिक संकट से भी उभारने का काम करता है हाल ही में कोरोना काल इसका ताजा उदाहरण है. इसका साधारण सा समाधान है कि किसान की सभी बुनियादी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए एक न्यायसंगत व सम्मानजनक आय की प्राप्ति हो और नीतियाँ किसानी के अनुकूल व समझने वाली हों. सवाल यह है कि क्या हम किसानों की समस्याओं का सही कारण नहीं खोज पाए या खोजना नहीं चाहते? किसान परिवार में आत्महत्या क्यों होती हैं? किसान गरीब क्यों है? क्या इनका सच्चा जवाब हमें देना नहीं चाहिए. दशकों से ऐसा जवाब ढूंढा जा रहा है. बड़ी-बड़ी रिपोर्टें तैयार की जाती है आयोग बनाये जाते हैं. लेकिन संकट गहराता ही जा रहा है. दिनों-दिन किसान असहाय ही होता जा रहा है और अपने पारम्परिक व स्वाभिमानी खेती-किसानी को छोड़ने के लिए मजबूर होता जा रहा है. क्या वाक्य ही दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, आधुनिक और विकसित होने जा रहा देश इस समस्या का समाधान करने में सक्षम ही नहीं है क्या या करना ही नहीं चाहता?
कृषि के बिना भारत तो आत्मनिर्भर नहीं हो सकता इंडिया की कह नहीं सकते। कृषि पर देश के लगभग 50 प्रतिशत कार्यबल की जिम्मेदारी है तो इसका सीधा मतलब है कि बड़ी आबादी इस पर निर्भर है। आंकड़ों के अनुसार देश के इतिहास पहली बार मनुफेक्चरिंग (11.6%) से ज्यादा लोग कंस्ट्रक्शन (12.4%) और होटल व् ट्रेड (12.1%) में रोजगार पा रहे है तो मतलब अर्थ-निति में कुछ गड़बड़झाला जरूर है अगर कृषि न होती तो सोचो देश कि 70 करोड़ आबादी कहाँ जाती। सरकार भूल रही है कि आज भी कृषि का जीवीए-जीवीओ (ग्रॉस वैल्यू एडेड और ग्रॉस वैल्यू आउटपुट) अनुपात उद्योग से कई गुना अधिक है, लेकिन मौसम की मार, मार्केट का शोषण, कृषि नीतियों में खामी जो किसानों को झेलना पड़ता है उद्योगपतियों को नहीं। ऐसे में यह मानना कि कृषि में इनपुट सब्सिडी, इनकम सप्लीमेंट या एमएसपी जैसी अन्य मदद देना कोई बड़ा अहसान है।
किसान के बहुत सारे दुःख हैं। ये दुःख बड़े गहरे हैं और इन दुःखों की कहानी भी बड़ी लम्बी है। किसान भी क्या इन्सान है। एक बहुत बड़ी त्रासदी का नायक है। परन्तु किसी को अपना दर्द सुना के राजी नहीं, इसे शिकवा-शिकायत की आदत नहीं और शोर मचाने का भी इसे शौक नहीं। इसीलिए हमारी सरकार समझती है कि किसान खुश है, आराम से हैं, और सुख-चैन की बंसी बजा रहा है। क्योंकि अगर इसे कोई तकलीफ होती तो जरूर चिल्लाता। देश में और वर्ग भी हैं, जो कि जरा-सा दुःख होते ही तुरन्त चिल्ला उठते हैं। सरकार उनकी सुनवाई करती है। ठीक भी है, जो चिल्लाता है, उसकी सुनी जाती है। परन्तु किसान तो दुःख दर्द में शिकायत करने के विषय में एक अनोखा वर्ग है। वास्तव में देखा जाए तो किसान है ही क्या? चलता-फिरता दर्द है, सशरीर दर्द है, मुसीबतों से सजा हुआ एक चित्र है और दुःखों की पोटली है। इसका दिल दुनियां के दुःखों से छलनी बना हुआ है। परन्तु इसके इन घावों के मुंह नहीं और यदि मुंह है तो इसमें जुबान नहीं। जिस दिन इसके घावों के मुंह पैदा हो गया और मुंह में जुबान हो गई, उसी रोज किसान की आह से पृथ्वी गर्ज उठेगी, आसमान कांप जाएगा। सब तरफ एक भयानक हलचल मच जाएगी। जो सरकार इस समय अपने अज्ञान के कारण सुख की नींद सोई है, उसकी नींद हराम हो जाएगी। और जो खुशामदी, चापलूस, नादान, अकर्तव्यता के पुजारी सरकारी कर्मकारी सरकार को झूठे सपनों के भुलावे में रखते हैं, वे गद्दारी, मक्कारी, अय्यारी और बदरूवाही की स्पष्ट तस्वीर बनकर उभर उठेगें।
भारत के जनजीवन एवं आर्थिक व्यवस्था में कृषि की भूमिका सदा से अहम रही है और भविष्य में भी रहेगी। आधुनिक जगत के कतिपय समीक्षक और अर्थशास्त्री यदाकदा कृषि के योगदान को कम आंकने की कुचेष्टा करते दिखाई देते हैं। उनका मुख्य तर्क है कि स्वतंत्रता के समय देश की सकल आय में कृषि का भाग लगभग 64-65 प्रतिशत था, जो अब घटकर 14-15 प्रतिशत रह गया है और आने वाले वर्षों में कम ही होता जाएगा। सर्वविदित तथ्य है कि आधुनिक तकनीकी एवं औद्योगीकरण के विकास के साथ-साथ जब अर्थव्यवस्था के अन्य घटकों का विस्तार होता है तब खेती पर निर्भर रहने वाली जनसंख्या का अनुपात तथा कृषि का अंशदान भी कम होता जाता है। सभी राष्ट्रीयकृत बैंकों की ग्रामीण शाखाओं का ऋण और जमा का अनुपात हमेशा से 30:70 रहता है। इसका सीधा अर्थ है कि ग्रामीणजन द्वारा बैंकों में जमा की जानेवाली राशि का केवल 30 प्रतिशत भाग ग्रामीण ऋण के रूप में दिया जाता है। शेष 70 प्रतिशत रकम अर्थव्यवस्था के अन्य घटकों के वित्तपोषण हेतु काम आती है। विनिर्मित उत्पादों और सेवाओं की लगभग 47-48 प्रतिशत मांग गांवों से आती है, जिसका मुख्य स्रोत यानि क्रयशक्ति खेती पर आधारित है। शहरों, उद्योगों, सेना एवं अर्द्धसैनिक बलों में काम करने वाले कर्मियों की 85-90 प्रतिशत संख्या ग्रामीणों की है। इन सब आंकड़ों से सिद्ध होता है कि अभी भी कृषक एवं ग्रामीण समाज का योगदान न केवल अन्य घटकों की अपेक्षा अधिक है बल्कि उन घटकों के अपने विकास हेतु भी अपेक्षित है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के पक्षधर अक्सर दलील देते हैं कि अब तो हमारे पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिकांश खाद्य पदार्थ हमारे आंतरिक बाजार से कम दाम पर उपलब्ध हैं, अत: उन्हें आयात करना आर्थिक दृष्टि से लाभकर रहेगा। इस संदर्भ में यह ध्यान रखना नितांत आवश्यक है कि कृषि और विशेषत: खाद्यान्न के उत्पादन में आत्मनिर्भरता न केवल खाद्य एवं पौष्टिक सुरक्षा बल्कि सीधे राष्ट्र की सुरक्षा का अपरिहार्य अंग है।
लगभग दशक से अर्थशास्त्रियों का एक बड़ा वर्ग यह दर्शाने का प्रयास करता है कि भारत में कृषि का उत्पादन अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका है और गेहूं तथा चावल जैसी कई फसलों का उत्पादन तो लगातार आवश्यकता से अधिक होने से उनके भंडारण और बड़ी मात्रा में सड़कर खराब होने के साथ-साथ सरकार के वित्तीय संसाधनों पर अनावश्यक दबाव बढ़ता जा रहा है। उनका तर्क है कि इन उत्पादों के सतत बढ़ते और बाजार से ऊंचे न्यूनतम समर्थन मूल्यों के कारण ऐसा हो रहा है। उनकी मान्यता है कि अब न तो कृषि का उत्पादन बढ़ाने की अवश्यकता है और न गुंजाइश। वे सुझाव देते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को समाप्त कर खेती को बाजार के भरोसे छोड़ने से स्थिति स्वत: संतुलित हो जाएगी। परंतु वे यह भूल जाते हैं कि वर्तमान भारतीय कृषि कई प्रकार के असंतुलनों से ग्रस्त है।
हमारी सरकारें या अफसरसाही एक उदहारण बड़े शौक से दे देते रहे हैं कि अमेरिका या दूसरे देशों है ऐसा होता है वैसा होता है और नक़ल कि तरफ दौड़ पड़ते है लेकिन ये भूल जाते हैं कि नक़ल के लिए अकल और सक्षमता भी चाहिए. आज के परिपेक्ष में अमेरिका की तरह भारतीय खेती के बाजार को खोल देना ठीक तो हो सकता है लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी सरकारें भी किसानो को अमेरिका जैसे देशों कि तरह हर साल 60 हजार डॉलर से भी ज्यादा कि सीधी सहायता दे सकती है? वहां पर तो खेती करने वालों की संख्या 1.2 प्रतिशत ही है और भारत में 50 प्रतिशत से भी ज्यादा लोग सीधे छोटी खेती से जुड़े हुए हैं. हो सकता है ऐसा करने से उत्पादन बढ़ेगा, गुणवत्ता भी बढ़ेगी और भारत बड़ा निर्यातक देश भी बन सकता हैं. लेकिन यह भी सच्चाई है की खेती-किसानी के मूल आधार किसान का विश्वास जीते बिना इस लक्ष्य की प्राप्ति मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव होगी.
किसान का कहना है वह असमंजस के साथ भयभीत भी है क्योंकि एक तो सरकार अपनी जिम्मेदारी से पिंड छुड़ाना चाह रही है. दूसरी और कृषि सुधार के नाम पर किसानों को निजी बाजार के हवाले कर रही है. हाल ही में देश के बड़े पूंजीपतियों ने लगभग 20 लाख करोड़ के रीटेल ट्रेड में आने के लिए कंपनियों का अधिग्रहण किया है. सबको पता है कि पूंजी से भरे ये लोग एक समानांतर मजबूत बाजार खड़ा कर देंगे. बची हुई मंडियां इनके प्रभाव के आगे खत्म होने लगेंगी. ठीक वैसे ही जैसे मजबूत निजी टेलीकॉम कंपनियों के आगे बीएसएनल समाप्त हो गई. इसके साथ ही एमएसपी की पूरी व्यवस्था धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी. कारण है कि मंडियां ही एमएसपी को सुनिश्चित करती हैं. फिर किसान औने-पौने दाम पर फसल बेचेगा. सरकार बंधन से मुक्त हो जाएगी.
देश को आत्मनिर्भरता की और ले जाने वाले प्रधानमंत्री जी ने जितनी बार भी कहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म नहीं और मेरा किसान आजाद हो जायेगा उतनी ही बार आम किसान का भरोसा कम ही होता गया और बात आंदोलन हठ तक पहुंच जाती है। बावजूद इस के किसान सरकार पर आशा भरी निगाहों से झाँक रहा है, शायद किसान को भगवान ने भी उम्मीद भरी जिंदगी को ख़ुशी और स्वाभिमान से जीने की एक अलौकिक शक्ति प्रदान की है.
सुरेश देशवाल
किसान चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स