Suresh Deswal

How Agriculture Drives Economic Growth

Agriculture has long been the backbone of economic development, playing a crucial role in poverty reduction, employment generation, and overall economic stability. From ancient civilizations to modern economies, farming and agribusiness have fueled growth by providing food security, raw materials, and trade opportunities. Here’s how agriculture continues to drive economic progress worldwide. 1. Employment and Livelihoods Agriculture remains one of the largest employers globally, especially in developing countries. According to the World Bank, over 60% of the population in Sub-Saharan Africa and 50% in South Asia depend on agriculture for their livelihoods. By creating jobs in farming, processing, and distribution, the sector reduces unemployment and supports rural economies. 2. Contribution to GDP In many nations, agriculture contributes significantly to the Gross Domestic Product (GDP). While industrialized economies may see a smaller percentage (e.g., ~1% in the U.S.), agriculture accounts for over 25% of GDP in some African and Asian countries. Growth in agricultural productivity directly boosts national income, enabling investments in infrastructure, education, and healthcare. 3. Food Security and Stability A strong agricultural sector ensures stable food supplies, preventing price shocks and hunger. Countries that achieve self-sufficiency in food production reduce import dependency, saving foreign exchange and strengthening economic resilience. For example, India’s Green Revolution in the 1960s transformed it from a food-deficient nation into a major exporter of rice and wheat. 4. Raw Materials for Industries Agriculture supplies raw materials for industries such as textiles (cotton), biofuels (sugarcane, corn), and pharmaceuticals (medicinal plants). Agro-based industries contribute to manufacturing growth, exports, and industrial diversification. For instance, Brazil’s ethanol industry thrives on sugarcane, boosting energy security and exports. 5. Trade and Export Earnings Agricultural exports are a major source of foreign exchange earnings. Countries like the Netherlands (horticulture), Thailand (rice), and Colombia (coffee) rely on farm exports to strengthen their trade balances. Global demand for high-value crops (e.g., avocados, organic foods) opens new revenue streams for farmers. 6. Rural Development and Poverty Reduction Investments in agriculture—such as irrigation, technology, and credit access—stimulate rural development. When farmers earn more, they spend on local goods and services, creating a multiplier effect. China’s agricultural reforms lifted 800 million people out of poverty since the 1980s by boosting rural incomes. 7. Technological Innovation and Agribusiness Modern agriculture leverages technology (AI, drones, precision farming) to increase yields sustainably. Agribusinesses—from farm machinery to food processing—generate employment and attract investments. Israel’s drip irrigation technology, for example, revolutionized water-efficient farming globally. 8. Economic Stability Agriculture provides stability to economies by ensuring food security and mitigating the impact of food price fluctuations. A strong agricultural base helps buffer against external shocks and promotes overall economic resilience. 9. Market Linkages Agriculture creates market linkages between rural and urban areas. Farmers supply produce to urban markets, creating demand for transportation, storage, and retail services. This interrelationship drives economic activity and regional development. Challenges and the Way Forward Despite its potential, agriculture faces challenges like climate change, land degradation, and market access barriers. Governments and private sectors must invest in: Conclusion Agriculture is not just about growing crops—it’s a powerful engine for economic growth, stability, and industrialization. By prioritizing agricultural innovation and inclusive policies, nations can harness its full potential to drive prosperity for future generations.

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बजट 2025-26 में किसानों के लिए नई योजनाएं

बजट 2025-26 में किसानों के लिए नई योजनाएं. वित्त मंत्री ने कहा कि कृषि क्षेत्र सरकार की प्राथमिकता है।  केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लगातार आठवीं बार केंद्रीय बजट 2025-26 पेश किया, विपक्ष के महाकुंभ भगदड़ को लेकर हंगामे के बावजूद वित्त मंत्री ने बजट पेश करना जारी रखा। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट 2025 में कृषि क्षेत्र के लिए 1.27 लाख करोड़ का आवंटन किया है हालाँकि कृषि के कुल आवंटन में 2.5% की कमी आई है। उन्होंने कृषि क्षेत्र के लिए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं। केंद्रीय बजट 2025 में कृषि, ग्रामीण विकास, रोजगार और आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी गई है। कृषि आय को बढ़ावा देने, छोटे उद्योगों को समर्थन देने और बुनियादी ढांचे में सुधार करने के उद्देश्य से बनाई गई नीतियों के साथ, भारत सरकार की आर्थिक प्रगति और आत्मनिर्भरता को मजबूती पर जोर दिया है। वित्त मंत्री ने कहा कि यह बजट विकास, वृद्धि और मध्यम वर्ग को मजबूत करने के लिए समर्पित है। भारत इस सदी के 25 साल पूरे कर रहा है और विकसित राष्ट्र का विजन प्रगति को गति दे रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है।उन्होंने कहा आज के बजट में 10 व्यापक क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित किया गया है जिसमें सबसे पहला नंबर है कृषि क्षेत्र। प्रधानमंत्री धन–धान्य कृषि योजना– यह योजना राज्यों की भागीदारी के साथ शुरू की जाएगी। इसके अंतर्गत कम उत्पादकता वाले 100 जिलों को शामिल किया गया है। इन जिलों में कृषि उत्पादक बढ़ाने फसल विविधीकरण और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाया जाएगा,  पंचायत और ब्लॉक स्तर पर फसल कटाई के बाद भंडारण को बढ़ाया जाएगा, सिंचाई सुविधा में सुधार होगा और दीर्घकालिक कालीन और अल्पकालिक ऋण की उपलब्धता को सुगम बनाया जाएगा। धन-धान्य कृषि योजना में 1.7 करोड़ किसान शामिल होंगे, इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों के लिए पर्याप्त अवसर पैदा करना है। दालों में आत्मनिर्भरता – वित्त मंत्री ने कहा कि केंद्र खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए राष्ट्रीय खाद्य तिलहन मिशन को लागू कर रहा है। उन्होंने कहा “हमारी सरकार उड़द, तुअर और मसूर पर ध्यान केंद्रित करते हुए दालों में आत्मनिर्भरता मिशन के तहत 6 साल का कार्यक्रम शुरू करेगी”। इसके अलावा वित्त मंत्री ने कहा कि आय के स्तर में वृद्धि के साथ-साथ फलों की खपत भी बढ़ रही है, इसलिए राज्यों के सहयोग से किसानों का पारिश्रमिक भी बढ़ेगा। बिहार पर विशेष ध्यान देते हुए उन्होंने कहा राज्य में मखाना बोर्ड की स्थापना की जाएगी, बोर्ड मखाना किसानों को प्रशिक्षण और सहायता प्रदान करेगा। बिहार में नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फूड टेक्नोलॉजी एंटरप्रेन्योरशिप एंड मैनेजमेंट Niftem बनाया जाएगा। किसानों के उत्पाद की गुणवत्ता बढ़कर उसकी आय में बढ़ोतरी करेगा। राष्ट्रीय मिशन उच्च उपज वाले बीज-वित्त मंत्री ने कहा कि मोदी सरकार उच्च उपज वाले बीजों पर राष्ट्रीय मिशन शुरू करेगी। इसका उद्देश्य अनुसंधान पारिस्थितिक तंत्र को मजबूत करना, उच्च उपज, किट प्रतिरोध और जलवायु लचीलापन वाले बीजों का लक्षित विकास और प्रसार करना और जुलाई 2024 से जारी 100 से अधिक बीज किस्म की व्यवसायिक उपलब्धता सुनिश्चित करना होगा। समृद्धि ग्रामीण के अंतर्गत समृद्ध गांव और अनुकूल कार्यक्रम प्रारंभ किया जाएगा। इसमें कौशल, तकनीकी और निवेश के माध्यम से रोजगार को बढ़ावा दिया जाएगा साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अधिक बल मिलेगा। योजना के पहले चरण में 100 विकासशील कृषि जिलों को शामिल किया गया है कार्यक्रम खास तौर पर युवाओं, सीमांत, छोटे किसान, भूमिहीन परिवार और ग्रामीण महिलाओं पर केंद्रित होगा। एमएसएमई के लिए लोन गारंटर कर 5 करोड़ से बढ़कर 10 करोड़, 1.5 लाख करोड़ तक का कर्ज दिया जाएगा। इसका लाभ केसीसी के दायरे में आने वाले लगभग 7.7 करोड़ किसानों, मछुआरों और पशु पालकों को मिलेगा। छोटे किसानों के लिए बजट की है बड़ी घोषणा है। कपास उत्पादकता मिशन के तहत कपास के पैदावार बढ़ाने के लिए 5 साल तक मिशन मोड पर काम होगा इससे देश के कपड़ा उद्योग को मजबूती मिलेगी। किसान की आमदनी बढ़ाने और परंपरागत कपड़ा क्षेत्र के लिए अच्छी कपास की आपूर्ति सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा। यूरिया संयंत्र असम के नामरूप में सालाना 12.7 मेट्रिक टन क्षमता वाला नया यूरिया संयंत्र स्थापित किया जाएगा। इस संयंत्र के साथ-साथ पूर्वी क्षेत्र में निष्क्रिय पड़ी इकाइयों में उत्पादन शुरू किया जाएगा, जिस देश में यूरिया की आपूर्ति को और अधिक बढ़ावा मिलेगा

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किसान दिवस – 2024  ‘किसान है कौन’ और ‘खड़ा कहाँ है’

हर साल की तरह इस साल भी राष्ट्रीय किसान दिवस मनाया जा रहा है, लेकिन कृषि के इस पेशे से अब अन्नदाता का मोहभंग होने लगा है.किसानों के प्रति बेरुखी से कृषि प्रधान देश गम्भीर भारत में ये घाटे का सौदा साबित हो रहा है.विकास के नाम पर सरकारी, राजनीतिज्ञ का कहीं यह वोट का अखाड़ा तो नहीं है। इससे उबरना होगा नहीं तो एक दिन किसान देश के मानचित्र से गायब हो जाएगा तथा अर्थव्यवस्था के नाम पर भारत दुनिया के नक्शे में अपना स्थान ढूंढता रह जाएगा। यह जानना जरूरी हो गया कि ‘किसान है कौन’ और ‘खड़ा कहाँ है’. किसान देश की अर्थव्यवस्था की रीड की हड्डी है। देश के आधे से अधिक कारोबार उद्योग व बड़े व्यापार किस पर टिके हैं….? जाहिर है यह सब किसानों की मेहनत के दम पर टिके हैं दुनिया के हर मनुष्य के पेट की क्षुधा  को कौन शांत करता है….? उत्तर स्पष्ट है “किसान और सिर्फ किसान”। लेकिन उसका हाल यह है कि वह सुविधा न मिलने के श्राप से ग्रस्त है। भारत में आज भी लगभग 70% लोग आज भी गांव में निवास करते हैं और उनकी आजीविका का मुख्य साधन खेती है। भारत में किसानों की संरचना जाति, नृजातीयता, धर्म, भाषा आदि पर आधारित है। भारत में कृषक वर्ग की संरचना का अध्ययन करते समय तथा भारतीय कृषि की प्रकृति का अध्ययन करते समय विभिन्न प्रकार के कृषक वर्गों का पता लगाने के लिए तीन सिद्धांत तैयार किए थे। तीन सूत्रीय सिद्धांत में जीवन से प्राप्त होने वाली सभी प्रकार की आमदनी शामिल हैं, (जैसे किराया, फसल तथा वेतन )। अधिकारों की प्रकृति (जैसे स्वामित्व तथा किराएदारी, फसल का हिस्सा या कोई अधिकार नहीं) तथा खेत में किया गया काम (कोई काम नहीं करना, आंशिक काम पारिवारिक श्रम द्वारा किया गया काम, वेतन के बदले काम करना आदि)। यह मापदंड भी भारत में कृषि कार्यों से जुड़े लोगों के तीन वर्गों की अलग-अलग पहचान करने में मदद करता है। भारत में इन तीनों वर्गों में जो लोग शामिल हैं, उन्हें भूस्वामी, किसान तथा मजदूर कहा जाता है, भूस्वामी खेती की जमीन के मालिक होते हैं – यह संपन्न व अमीर होते हैं। किसान उन्हें कहते हैं जो खेतों में स्वयं काम करते हैं। वे या तो अपनी जमीनों के मालिक होते हैं या अन्य भूस्वामीयों के खेतों को किराए पर लेकर उन पर खेती करते हैं। इन किसानों को भी दो श्रेणियां में बांटा जा सकता है – छोटे भूस्वामी, तथा जीवन-निर्वाह करने के लिए दूसरों के खेत किराए पर लेकर उनमें फसलें उगाने वाले किसान। कृषि पर निर्भर तीसरा वर्ग जो मजदूर कहलाता है, उसे भी तीन उपविभागों मैं बांटा जा सकता है – कुल कम जमीन वाले गरीब किसान, बटाई पर खेती करने वाले भूमिहीन मजदूर। भू-स्वामियों की आय का मुख्य स्रोत उनकी जमीन पर उनके मालिकाना हक था। बड़े भूस्वामी जमीदार कहलाते थे। वह अपनी कृषि भूमि को ऊंचे किराए पर फसल उगाने वाले किसानों को देते थे। उन्हें जमीन किराए पर उठाने के बदले मोटी रकम मिल जाती थी, फिर भी वे मजदूरों की पगार में कटौती करते रहते थे। बड़े-भूस्वामी में कृषि संबंधी कोई काम नहीं करते थे। वह अच्छी पैदावार के लिए भूमि प्रबंधन का दायित्व भी अपने हाथों नहीं रखते थे। दूसरी श्रेणी के भू-स्वामी भी बड़ी जमीनों के मालिक थे। उनकी जमीनें उनके निवास स्थान के निकटवर्ती क्षेत्र में होती थी। ये भी संपन्न होते थे और खेतों में स्वयं काम नहीं करते थे। यह मजदूर से खेतों में काम करवाते थे और स्वयं उनके कामों का निरीक्षण करते थे। मजदूर ही खेतों में काम करते थे और भूमि प्रबंधन करते थे या तो जमीनों पर उनके अधिकार पारंपरिक होते थे या उनके अपनी जमीनों के अधिकारियों पर वैधानिक अधिकार भी होते थे। परंतु वे मालिकों के बराबरी के नहीं होते थे। किसने की अन्य श्रेणियां में छोटे भू-स्वामी होते हैं जो स्वयं अपने खेतों में काम करते हैं। वे केवल फसल काटने के लिए मजदूरों को काम पर लगाते हैं, अन्य सारे काम स्वयं करते हैं। दूसरी और वे किसान होते हैं जो बहुत सारी जमीनें किराए पर ले लेते हैं और इन खेतों में काम करके फसलें उगाने के इनके अधिकार सुरक्षित रखते हैं। किसानों की तीसरी श्रेणी में वे मजदूर आते हैं जो दूसरों के खेतों में काम करके गुजारा करते हैं। वे कुछ जमीन फसल उगाने के लिए भू-स्वामियों से ले लेते हैं और उसमें होने वाली पैदावार से अपने परिवारों का जीवन- निर्वाह करते हैं। उनके जमीनों पर काम करने के अधिकार अस्थाई होते हैं। वे इसके बदले मजदूरी प्राप्त करते हैं और यह मजदूरी भूमि की पैदावार से ही प्राप्त करते हैं। अत: वे उतना ही पैदा करते हैं जितने में उनकी मजदूरी निकल जाए। दूसरी उप श्रेणी में फसलों में साझेदारी आती है। वे खेतों में दूसरों के लिए काम करते हैं और फसल में हिस्सा लेते हैं। अंतिम उप श्रेणी में भूमिहीन मजदूर आते हैं। अब मजदूरी पर दूसरे के खेतों में काम करते हैं और मजदूरी के रूप में जो भी उन्हें प्राप्त होता है उसे अपने परिवारों का पालन-पोषण करते हैं। किसानों की राजनैतिक अर्थव्यवस्था; प्रायः बाहरी संगठनों द्वारा किसानों का राजनैतिक शोषण होता है। इसके लिए किसानों की राजनैतिक अर्थव्यवस्था जिम्मेदार होती है। यहां व्यापक रूप से बाजार मूलक अर्थव्यवस्था का विस्तार हो जाता है वहां उनकी संभावना अधिक बढ़ जाती है। बाजार की राजनीति द्वारा किसानों के शोषण की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे शोषण तथा बाजार की राजनीति के सामने घुटन टेकने की व्यवस्था से बचने के लिए यह आवश्यक है कि किसान जागरूक हो और अपने हितों की सुरक्षा के लिए संघर्ष करें न कि बाहरी दबावों के आगे समर्पण कर दें। इसलिए किसान बाजारों के साथ लंबे समय तक चलने वाले आर्थिक सौदे नहीं करते अथवा यह कहें कि वे बाजारों की विचारधारा उसको पूरी तरह स्वीकार नहीं करते। उनके उत्पादन के केंद्र में अपने जीवन निर्वाह और आजीविका चलाना प्रमुख रूप से मौजूद रहता है। कृषक समाजों में नेता स्वार्थी प्रवृत्ति के होते हैं और वह अपने निहित स्वार्थ के लिए कृषक अर्थव्यवस्था में राजनीतिक मामले शामिल कर देते हैं। आमतौर पर किसानों

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कार्बन क्रेडिट का मुद्रीकरण: भारतीय किसान कैसे लाभान्वित हो सकते हैं

कार्बन क्रेडिट का मुद्रीकरण: भारतीय किसान कैसे लाभान्वित हो सकते हैं खराब मिट्टी की सेहत और घटता मुनाफ़ा भारतीय किसानों की  परेशानी का सबब बन रहा है। कार्बन क्रेडिट बेचना इन समस्याओं को हल करने का एक अवसर हो सकता है। घरेलू कार्बन बाजार विकसित करने का उद्देश्य ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2022 में शामिल किया गया था, जिसे 8 अगस्त को लोकसभा में पेश और पारित किया गया था। जबकि विधेयक नवीकरणीय ऊर्जा उद्योग पर केंद्रित है, देश के किसान को भी यह अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचा सकता है। भारत की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या कृषि में कार्यरत है। मिट्टी और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता को देखते हुए, कृषि जलवायु संकट और भूमि क्षरण, कीमतों में बाजार की अस्थिरता और बढ़ती इनपुट लागत सहित इसके प्रभावों से काफी प्रभावित होती है। इससे कृषि उत्पादन की स्थिरता और उस पर निर्भर लोगों की आजीविका प्रभावित होती है। मृदा स्वास्थ्य में सुधार महत्वपूर्ण है हरित क्रांति के बाद से उर्वरकों और कीटनाशकों के गहन उपयोग ने मिट्टी में कार्बन के स्तर को कम कर दिया है और मिट्टी को ख़राब कर दिया है। विभिन्न अनुमानों से पता चलता है कि भारत के कुल भौगोलिक भूमि क्षेत्र का 30 प्रतिशत तक क्षरण हो चुका है – इस भूमि का लगभग आधा हिस्सा कृषि भूमि है, विशेष रूप से असिंचित/वर्षा आधारित कृषि भूमि। मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ होते हैं जिनमें कार्बन, नाइट्रोजन और फास्फोरस जैसे तत्व होते हैं। मिट्टी का लगभग 50 प्रतिशत कार्बनिक पदार्थ कार्बन से बना है। इस प्रकार, मृदा कार्बन माप समग्र मृदा स्वास्थ्य का एक अच्छा संकेत प्रदान करता है। मृदा कार्बन पृथक्करण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा हवा के कार्बन डाइऑक्साइड को निकाला जाता है और मिट्टी के कार्बन पूल में संग्रहीत किया जाता है। प्रकाश संश्लेषण के दौरान, पौधे वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड और पानी को ऑक्सीजन, चीनी और कार्बन युक्त यौगिकों में तोड़ देते हैं। ये जड़ों और नीचे की मिट्टी तक पहुंचते हैं और मिट्टी के नीचे के जीवों को पोषण देते हैं। मिट्टी के नीचे बायोमास में कमी, मिट्टी के कटाव में वृद्धि, और अधिक जुताई के कारण कार्बन डाइऑक्साइड का उच्च प्रतिशत वापस हवा में छोड़ दिया जाता है, जिससे मिट्टी में कार्बन की मात्रा कम हो जाती है। ऐसी प्रथाएं हैं जिनका पालन किसान मिट्टी के स्वास्थ्य को बहाल करने के लिए कर सकते हैं मृदा स्वास्थ्य में सुधार के लिए बायोमास बढ़ाने और मिट्टी से कार्बन के नुकसान को कम करने वाली तकनीकों को अपनाया जाना चाहिए। ये इन पुनर्योजी कृषि पद्धतियों में शामिल हैं: • अवशेषों की मल्चिंग और मिट्टी के जैव अपशिष्ट का पुनर्चक्रण • खाद, कम्पोस्ट और जैवउर्वरक का उपयोग • बेहतर फसल चक्र और अंतरफसल • बाढ़ सिंचाई और रासायनिक उपयोग को कम करना • भूमि को हर समय ढका रखने के लिए ढककर फसल उगाना जब किसान कुछ मौसमों तक इन प्रथाओं का पालन करते हैं, तो मिट्टी की कार्बन सामग्री में सुधार होता है। फलस्वरूप उपज भी बढ़ती है। हालाँकि, किसानों को इन प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहन की आवश्यकता हो सकती है क्योंकि ये समय लेने वाली और महंगी हो सकती हैं, और अल्पावधि में अलाभकारी हो सकती हैं। स्वैच्छिक कार्बन बाजारों में कार्बन क्रेडिट का व्यापार करने की क्षमता इस प्रोत्साहन के रूप में काम कर सकती है। कार्बन क्रेडिट मुद्रीकरण एक चुनौती हो सकता है चूँकि मृदा स्वास्थ्य में सुधार स्वाभाविक रूप से मृदा कार्बन स्तर को बढ़ाने की क्षमता से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे प्राप्त करने के लिए मृदा कार्बन स्तर की निरंतर निगरानी और इसके सुधार के लिए प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है। मृदा कार्बन के मुद्रीकरण के लिए कार्बन क्रेडिट की अच्छी समझ की आवश्यकता होती है। कार्बन क्रेडिट ऐसे प्रमाणपत्र हैं जो ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें हवा से बाहर रखा गया है या इससे हटा दिया गया है। एक कार्बन क्रेडिट प्रमाणित करता है कि वायुमंडल से एक मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड हटा दिया गया है। रिमोट सेंसिंग डेटा और एआई में प्रगति ने उपग्रह डेटा के माध्यम से कार्बन स्तर की भविष्यवाणी को सक्षम किया है, और यह उन तरीकों में से एक के रूप में कार्य करता है जिसके माध्यम से कार्बन क्रेडिट की गणना की जाती है। कंपनियाँ और सरकारें अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए कार्बन क्रेडिट खरीदती हैं। कार्बन बाज़ार में भाग लेने से किसानों को लाभ हो सकता है इसका सीधा लाभ यह है कि किसानों को उस कार्बन के लिए नकद-आधारित प्रोत्साहन मिलता है, जिससे उन्होंने अपनी भूमि में कार्बन को अलग करने में मदद की है। एक किसान जो एक कार्बन क्रेडिट लेता है, वह मौजूदा बाजार कीमतों पर लगभग 780 रुपये कमा सकता है, लेकिन बड़े निगम कार्बन क्रेडिट के बड़े हिस्से को सीधे खरीदने पर किसानों को बेहतर दरें – 2,000 रुपये तक – प्रदान करने की संभावना रखते हैं। हमारे अनुभव में, जो किसान पुनर्योजी प्रथाओं का पालन करते हैं वे प्रति एकड़ एक से चार कार्बन क्रेडिट जमा करने में सक्षम हैं। किसानों को जो अप्रत्यक्ष लाभ अनुभव होता है वह मिट्टी में जमा कार्बन के कारण मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार है। इस सुधार का अनुमान यह निर्धारित करके लगाया जा सकता है कि क्या मिट्टी निम्नलिखित में से कोई भी विशेषता प्रदर्शित करती है: बढ़ी हुई जल धारण क्षमता, कम मिट्टी का घनत्व, पानी की घुसपैठ में वृद्धि, पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि और मिट्टी की सतह के तापमान में कमी। कार्बन क्रेडिट कार्यक्रम किसानों के लिए कैसे काम करते हैं? हालाँकि व्यक्तिगत किसानों के लिए इस मार्ग पर चलना आसान नहीं है, गैर-लाभकारी और किसान-उत्पादक संगठन (एफपीओ) उन्हें कार्बन क्रेडिट कार्यक्रमों का लाभ उठाने में मदद कर सकते हैं। 1. एक समूह के रूप में पुनर्योजी कृषि पद्धतियों का पालन करें गैर-लाभकारी संस्थाओं/एफपीओ के लिए पहला कदम अपने किसान समूहों के बीच पुनर्योजी कृषि प्रथाओं को बढ़ावा देना है, विशेष रूप से मिट्टी के कार्बनिक पदार्थ और मिट्टी के कार्बन को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना है। चूंकि इसमें समय लग सकता है और शुरुआत में पैदावार कम हो सकती है, इसलिए शुरुआती वर्षों के दौरान किसानों को

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कृषि एवं किसानों के लिए कैबिनेट ने 13,966 करोड़ की 7 योजनाओं को दी मंजूरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की 2 सितंबर को बैठक हुई। वहीं बैठक के बाद कृषि से जुड़े प्रस्तावों की मंजूरी की केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव द्वारा जानकारी दी गई। इस दौरान उन्होंने कहा कि देश के किसानों की आय और उनकी जिंदगियों को सुधारने के लिए कैबिनेट की तरफ से 7 प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है। जिसका देशभर के सभी किसानों को लाभ मिलेगा. यह कार्यक्रम डिजिटल कृषि मिशन, फसल विज्ञान इत्यादि शामिल है. केंद्र सरकार की तरफ से किसानों के लिए सप्ताह का पहला दिन तोहफा लेकर आया है. किसानों को बड़े स्तर पर फायदा देने वाली सात योजनाओं को मंजूरी दी गई है. विस्तार से चर्चा करें तो मंत्रिमंडल द्वारा एग्रीकल्चर सेक्टर से जुड़े 7 बड़े कार्यक्रमों के लिए लगभग 14 हजार करोड रुपए के खर्च को मंजूरी दी गई है. पीएम नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की मीटिंग में फैसला इन कार्यक्रमों की मंजूरी देने का फैसला किया गया है. इसमें इसमें फसल विज्ञान, मिशन डिजिटल, कृषि जैसी लाभकारी योजनाएं भी शामिल है. सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मंत्रिमंडल में लिए गए फैसलों की जानकारी मीडिया को दी. कृषि सेक्टर में इन सात कार्यक्रमों के लिए 13960 करोड रुपए से ज्यादा का आवंटन किया गया है. अश्विनी वैष्णव ने कहा कि, ‘ आज सोमवार को कैबिनेट मीटिंग में किसानों के जीवन को और ज्यादा सुविधाजनक और बेहतर बनाने के लिए एवं आय में इजाफा करने के लिए सात बड़े फैसले केंद्र सरकार द्वारा लिए गए हैं. इसमें डिजिटल कृषि मिशन जो खेती के लिए डिजिटल सार्वजनिक संरचना की तर्ज पर विकसित किया जा रहा है. आई नजर डालें सात कार्यक्रमों पर, कृषि शिक्षा, प्रबंधन और सामाजिक विज्ञान को मजबूत करना: कुल 2,291 करोड़ रुपये के बजट के साथ इस योजना का उद्देश्य कृषि अनुसंधान और शिक्षा को आधुनिक बनाना है। यह योजना नई शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप है और इसमें AI, बिग डेटा और डिजिटल DPI सहित नवीनतम तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें प्राकृतिक खेती और जलवायु रिजिलेंस को भी शामिल किया जाएगा। बागवानी का सतत विकास: 860 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ, इस योजना का उद्देश्य बागवानी के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाना है। इसमें उष्णकटिबंधीय, उपोष्णकटिबंधीय और समशीतोष्ण फसलों के साथ-साथ जड़, कंद, बल्बनुमा, सब्जी, फूलों की खेती और औषधीय पौधों सहित कई तरह की फसलें शामिल हैं।  सतत पशुधन स्वास्थ्य और उत्पादन: 1,702 करोड़ रुपये के बजट वाली इस योजना का उद्देश्य बेहतर पशुधन और डेयरी उत्पादन के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाना है। इसमें पशु स्वास्थ्य प्रबंधन, पशु चिकित्सा शिक्षा, डेयरी उत्पादन तकनीक और पशु आनुवंशिक संसाधन प्रबंधन शामिल हैं।  डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन: 2,817 करोड़ रुपये के बजट के साथ, इस मिशन का उद्देश्य किसानों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना है। यह योजना दो आधारभूत स्तंभों- एग्री स्टैक और कृषि निर्णय सहायता प्रणाली पर आधारित है। इसमें एआई, बिग डेटा और सेटेलाइट डेटा जैसी उन्नत तकनीकें शामिल हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 23 जुलाई को पेश बजट में कृषि के लिए डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की घोषणा की थी। खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए फसल विज्ञान: 3,979 करोड़ रुपये के आवंटन वाली इस योजना का लक्ष्य किसानों को जलवायु-अनुकूल खेती और देश को 2027 तक खाद्य सुरक्षा के लिए तैयार करना है। इस योजना के छह स्तंभों में अनुसंधान और शिक्षा, आनुवंशिक सुधार, दलहन व तिलहन फसलों में सुधार के साथ ही कीटों, सूक्ष्म जीवों और परागणकों पर अनुसंधान शामिल हैं। प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन: 1,115 करोड़ रुपये के बजट के साथ, यह योजना दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता सुनिश्चित करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करती है। कृषि विज्ञान केंद्रों को मजबूत बनाना: कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) में सुधार के लिए 1,202 करोड़ रुपये के परिव्यय को मंजूरी दी गई है। ये केंद्र किसानों को कृषि तकनीक हस्तांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

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Bio E3 policy aims to enhance India’s bio-manufacturing ecosystem through innovation-driven support.

The Union Cabinet chaired by Shri Narendra Modi has approved the ‘BioE3 (Biotechnology for Economy, Environment and Employment) Policy’ proposed by the Department of Biotechnology. The policy aims to promote high-performance bio-manufacturing in India. BioE3 policy will prove to be a milestone not only for bio-economy but a game changer for Viksit Bharat @2047 “As India emerges as a Global Biotech Powerhouse, Prime Minister Narendra Modi will be hailed across the world as the champion of new Biotech Boom” says Union Minister Dr. Jitendra Singh The PPP model will be an intrinsic part of Bioe3 Policy implementation incentivizing the industry to promote employment generation India’s bio-economy skyrockets from $10 billion in 2014 to over $130 billion in 2024, with projections to reach $300 billion by 2030: Dr. Singh  “The BioE3 policy will significantly impact various sectors such as food, energy, and health,” the Science and Technology Minister said. He also highlighted six thematic topics which were 1. Bio-based chemicals and enzymes; 2. Functional foods and smart proteins; 3. Precision Biotherapeutics; 4. Climate-friendly agriculture; 5. Carbon capture and its use;  6. Futuristic marine and space research. Reiterating the success achieved in the space and bio-economy sectors, the Minister underlined that the PPP model will be an intrinsic part of the Bioe3 policy implementation to incentivize industry to boost job creation. The policy is a push towards a green, low-consumption, and self-reliant India and aims to harness global challenges such as climate change, unsustainable patterns of material consumption, and waste generation to bring about sustainable innovation. A primary objective of the initiative taken by the Department of Biotechnology is to encourage the transformation of chemical-based industries into more sustainable bio-based industrial models by promoting a circular economy. The policy focuses on six key sectoral pillars: high-value bio-based chemicals, bio-polymers and enzymes, smart proteins and functional foods, precision bio-medicals, climate resilient agriculture, carbon capture and its utilization, marine and space research. Other key aspects of the Bio-e3 policy include innovation-driven research and development and entrepreneurship across various thematic sectors to expedite technology commercialization by establishing bio-manufacturing, bio-foundry, and bio-AI hubs. polymers, bio-plastics, bio-In the interim budget presented before the elections, Finance Minister Nirmala Sitharaman had mentioned, “A new scheme of bio-manufacturing and bio-foundry to provide eco-friendly alternatives like biodegradable polymers, bio-plastics, bio-pharmaceuticals and bio agri-inputs”. Releasing the policy today, Union Science and Technology Minister Dr Jitendra Singh said that the world’s future economy will be largely bio-powered and India has the opportunity to lead the bio-revolution of the 21st century. “Just as the West led the IT-driven industrial revolution of the 1990s, India can lead the next bio-driven revolution because it is in an advantageous position in terms of bio-resources and bio-economy, allowing the West to Couldn’t find happiness.”, Concerned,” he said. Dr Singh also emphasized that the world will fundamentally change when global economies stop relying on the manufacturing sector and rely more on recycling processes. “The economies of the future will depend on taking what you waste and recycling it appropriately to become more independent domestically.” he said, the Bio-E3 policy is in line with the government’s initiatives of ‘Green Growth’, ‘Net Zero’ Economy, ‘Eco Lifestyle’, Make in India and Self-reliant India. “I am sure that this initiative will proudly contribute to Vision 2047 in the form of a bio-science aspect.” This policy aims to leverage biotechnology for sustainable growth, with a strong emphasis on agriculture. Here’s how it can help the agriculture sector: Overall, the India Bio-E3 Policy is designed to transform agriculture by integrating advanced biotechnological practices, making it more sustainable, resilient, and economically viable for farmers.

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