कार्बन क्रेडिट से किसान कैसे होंगे लाभान्वित

जितेंदर मोर, अध्यक्ष किसान चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स
4 अक्टूबर 2026, गुरबचन सिंह फाउंडेशन रिसर्च एजुकेशन एंड डेवलोपमेन्ट (GSFRED) पेहोवा रोड करनाल द्वारा आयोजित किसान मेले में किसान चम्बेर ऑफ़ कॉमर्स द्वारा आयोजित वर्कशॉप " कार्बन क्रेडिट से किसान कैसे होंगे लाभान्वित" में अध्यक्ष श्री जितेंदर मोर ने किसानों को सम्बोधित करते हुए और समझाते हुए पूरी प्रक्रिया को विस्तार से बताया और हर बिंदु पर प्रकाश डाला और आने वाले अड़चनों का भी निवारण बताया और भरोसा दिलाया की हरियाणा में कृषि वानिकी (agroforestry) में बहुत ही जल्दी किसान चैम्बर छोटे किसानों को भी कार्बन क्रेडिट का लाभ दिलवाएगा।
हरियाणा के छोटे और मंझोले किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की शुरुआत हुई है। किसान चैंबर ऑफ कॉमर्स (KCC), द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) तथा वैल्यू नेटवर्क वेंचर्स (VNV) ने मिलकर एक त्रिपक्षीय समझौता (MoU) किया है, जिसके माध्यम से हरियाणा में किसानों को कार्बन क्रेडिट से अतिरिक्त आय उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य किया जाएगा। यह समझौता 9 जुलाई 2026 को नई दिल्ली के संविधान क्लब में सम्पन्न हुआ।
• कार्बन क्रेडिट क्या है?
अगर किसान अपने खेत में नए पेड़ लगाता है या ऐसी खेती की पद्धति अपनाता है जिससे वातावरण से अधिक कार्बन हटे या उत्सर्जन कम हो, तो उस अतिरिक्त लाभ को वैज्ञानिक तरीके से मापा जा सकता है। सत्यापन के बाद उसी के आधार पर कार्बन क्रेडिट बन सकते हैं।
• सिर्फ पेड़ लगाने से अपने-आप क्रेडिट नहीं मिलता।
जमीन की पात्रता, पुराने भूमि उपयोग, पौधारोपण का वर्ष, प्रजाति, पेड़ों की संख्या, जीवित रहने की दर और खेत की लोकेशन जैसी जानकारी जरूरी होगी।
• पुराने पेड़ों का भी रिकॉर्ड जरूरी है।
पहले से मौजूद पेड़ों का कार्बन बेसलाइन में माना जाएगा। कार्बन क्रेडिट मुख्य रूप से परियोजना के कारण हुए अतिरिक्त कार्बन लाभ पर मिलेगा।
• किसान की जमीन किसान की ही रहेगी।
कार्बन परियोजना का उद्देश्य जमीन लेना नहीं, बल्कि किसान के खेत पर होने वाले अतिरिक्त जलवायु लाभ को मापकर उसके लिए अतिरिक्त आय का अवसर बनाना है।
• पेड़ काटने पर पूरी रोक जैसी बात नहीं है।
लेकिन प्रजाति, कटाई का समय, पुनःरोपण और पेड़ों की निरंतरता का रिकॉर्ड जरूरी होगा ताकि परियोजना का कार्बन लाभ बना रहे।
• रिकॉर्ड रखना बहुत महत्वपूर्ण होगा।
किसान का नाम, गांव, खेत की पहचान/Khasra, geolocation/KML, पौधारोपण का वर्ष, species, number of trees और plantation area जैसी जानकारी सही होनी चाहिए। जो कहीं भी साँझा नहीं होंगी।
किसानों को क्या होगा लाभ?
इस पहल से किसानों को अनेक प्रकार के लाभ मिलने की संभावना है—
• पारंपरिक खेती के साथ अतिरिक्त आय का स्रोत।
• कृषि-वानिकी (Agroforestry): खेतों की मेड़ों पर या खाली पड़ी जमीन पर पेड़ (जैसे पॉपलर, सफेदा, सागौन आदि) लगाना। फलदार भी लगा सकते हैं।
• मिट्टी की उर्वरता और जैविक कार्बन में वृद्धि।
• रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता में कमी।
• जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा।
• जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक टिकाऊ कृषि व्यवस्था।
• भविष्य में अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजार से जुड़ने के अवसर।
KCC किसानों को जोड़ने और समन्वय करने की भूमिका निभाएगा।
TERI तकनीकी पात्रता, feasibility, carbon estimation और MRV से जुड़ा काम करेगा;
VNV परियोजना में निवेश और carbon market प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगा.
• राजस्व तभी आएगा जब क्रेडिट वास्तव में जारी और बेचे जाएँ। इसलिए किसानों से यह नहीं कहना चाहिए कि “इतने रुपये निश्चित मिलेंगे।” बेहतर संदेश है कि यह फसल/लकड़ी की सामान्य आय के ऊपर एक अतिरिक्त आय का अवसर है।
• Haryana project arrangement के अनुसार, Total carbon revenue का 50% हिस्सा किसानों के खाते में जायेगा,बाकि से कंपनी अपने खर्चे पुरे करेंगी। लेकिन भुगतान credit issuance और sale के बाद ही संभव होगा.
• आगे चलकर केवल agroforestry ही नहीं, बल्कि Sustainable Agricultural Land Management (SALM) जैसी गतिविधियाँ भी देखी जा सकती हैं, जैसे residue management, reduced tillage, nutrient management और efficient irrigation, जहाँ वास्तविक और मापने योग्य बदलाव हो।
“कार्बन क्रेडिट को बोनस आय की तरह समझिए, गारंटीशुदा आय की तरह नहीं। किसान अपनी जमीन और खेती जारी रखेगा, लेकिन यदि वह योग्य जमीन पर अतिरिक्त पेड़ लगाता है, उन्हें संभालता है और सही रिकॉर्ड रखता है, तो उस अतिरिक्त कार्बन लाभ को मापकर भविष्य में कार्बन बाजार से अतिरिक्त आय प्राप्त करने का अवसर बन सकता है। KCC, TERI और VNV इसी व्यवस्था को किसानों के लिए वैज्ञानिक, पारदर्शी और व्यावहारिक बनाने पर काम कर रहे हैं।”
कार्बन क्रेडिट व्यवस्था भारतीय किसानों को केवल "अन्नदाता" ही नहीं, बल्कि "पर्यावरण रक्षक" के रूप में भी स्थापित कर रही है। किसान चैंबर ऑफ कॉमर्स का मानना है कि यदि इस मॉडल को जमीनी स्तर पर व्यापक रूप से लागू किया जाए, तो यह भारतीय कृषि को टिकाऊ, लागत-मुक्त और अधिक लाभदायक बनाने में मील का पत्थर साबित होगा।
